गुरुवार, 4 सितंबर 2014

गरीब का दान

गरीब का दान-


साहूकार दान से नाम कमाते,

हमारे ही धन को दान बनाते,

फिर चर्चे उनको ही दानवीर का दर्जा दिलाते,

साहेब हम क्या जाने? हम तो गरीब आदमी है।

अपनी पुरानी कमीज़ भीख मे दे दी,

चार पैसो की कमाई से एक आश्रिता को दे दी,

हमारा नाम तो कागज़ पर क्या किसी लब से भी ना सुनाई दी,

साहेब हम क्या जाने? हम तो गरीब आदमी है।

आश्रिता के रिश्ते भी ज़रूरत भर के,

उनके अपने भी हमे न चाहे जी भर के,

वक़्त बदलते ही हमसे दूर ही है पास हो करके,

क्या बदला हम क्या जाने? हम तो गरीब आदमी है।

अरमान


सोमवार, 11 अगस्त 2014

तेरे बिना......

सुनो न.... ईन जाते हुये लम्हों की कड़ी अपनी ज़िंदगी के साथ यही छोड़े जाती हूँ,
इस लम्हे के उसपार किसी और की ज़िंदगी बनाने जाती हूँ।
हमारे सफर को रोक लो, तुम्हें चलना है अब मेरे बिना…..

खुद की सुध जिन बाहों से वापस ले जा ना सकी,
उन बाहों को समेट लेना बस थोड़ी सी ही जगह की उम्मीद से पास तुम्हारे छोड़े जाती हूँ।
मुझे अपने सफर पर चलना है अब तेरे बिना......



बेसुध ये जिस्म लेकर सजाके बैठी हूँ दुनिया की महफिल में,
इस सजावट की तेज़ रौशनी भी जिसे रौशन न कर सकी उस अंधेरे को दिल में लिए जाती हूँ।
इस अंधेरे में प्यार का दिया अब जल न सकेगा हमारे बिना.....

ये हुस्न कभी किसी की दीवानी थी, जिसे जज़्बात से अलग किए जाती हूँ,
मैं बिक चुकी हूँ कुछ रिशों के हिसाब मे, पर मैं कोई सौदा नहीं अमानत याद की दिये जाती हूँ।
मेरे दिल के तुम खुदा थे अब समझी हूँ, जब रही हूँ तेरे बिना….


==èराकेश कृत

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

भीख


फटी साड़ी से तन ढका था,
उसी साड़ी के आँचल रहित छोर को हथेली पर थामा था,
पेट रहित उदार की भूक के लिये हाथ पसारा था।

सिर के रूखे बालों को देखा,
सड़को की रेत से उनको सजा रक्खा था,
तेज हवा का झोका भी उनको लहरा न पाता था,

उसके बिखरे बरतन को देखा,
चार ही तादाद थे और अनाज कोई दाना भी न था,
न घर जैसी कोई चीज़ थी, ना रसोई का ठिकाना था।
न प्यार की झलक थी, न सपनों का फसाना था।
ना उचाई को पाना था, ना गिरने का कोई बहाना था।
चौधियाई आखों से हर हर किसीकों ताक रही थी,
उम्मीद हर कसी से थी, पर पाना शायद कुछ से ही था,
दो पैसों की ज़रूरत थी, दो पैसों की ही उम्मीद थी,
दो पैसों की ही भूक थी और दो पैसों से ही प्यार था।
   मेरे तो चार पैसे भी थे
              फिर भी क्यों कुछ और भी पाने का दीवाना था।

राकेश कृत -----



खोई सूरत ------------......,,,,,?


ये चेहरा ही है या रंगीन परछाई कोई,
सूना है चेहरा जैसे मीठा पर अधूरा सपना कोई।
किसकी चाहत है जो मन को बांधे है,
कहीं होश ही न खो देना, जैसे अपना ही खोया हुआ दिल फिर पाया हो कोई।
बिखरी है हालत खुद की सुध ही न कोई,
समेट लो अपने दामन को,
कहीं ये आता वक़्त ही न बना दे इन्हे यादों का बीता पल फिर कोई।
नज़रें हटा लो क्यूँ बनी हो मूरत कोई,
क्यूँ भूल बैठे हो खुद को, तुम हकीकत हो ना के ख्वाब कोई।
ना इस खामोशी से चाहो खुदा की इबादत की तरह,


ये मेरी वफा का नशा है उसपर तुम खुद भी नशा हो कोई।

---राकेश कृत 

पानी की लकीरें (कविता)


आज बारिश की बूद ने फिर याद दिलायी,और पानी की लकीर कब आँसू बन गए। 

तेज़ बारिश होती रही, तन भीगता रहा, आँखों में पुरानी तस्वीर साफ़ होते गए।  

जब एक छाते मे सिमटे भीग रहे थे, और भीगे लिबाज़ तन से लिपटे हुए थे,

पूरी दुनिया ही उस छाते में समाई थी, साँसे गर्म थी जबकि भीगे बदन थे।

दोनों करीब थे बस हाथों को हाथों का स्पर्श था, इस करीबी से ही दिल का सुकून था।

बारिश के छींटे चेहरे पर हमारे बिखरे पड़े थे,

भीगा वक़्त भी चला जा रहा था पर हम थम गए थे।

हम जब तक रहे खोये रहे, अब तो वक़्त मे ही कही खो गए।

आज हूँ मैं खड़ा बस देखता ही रहा, बारिश थी हो रही पर आज हम साथ न थे,

तन भीगता ही रहा आंखे रोती रही, पर आँसू पानी की लकीरों मे खोते गए।

.......राकेश कृत........

पानी की लकीरें (कहानी)

                                                     
(१)
बारिश तेज़ थी, स्टेशन से निकलकर शेयरिंग ऑटो के लिए स्टेशन रोड पर घूमने लगा । आज मुझे ऑफिस के लिए कोई जल्दी नहीं थी । पर दुसरे कामकाजी लोगो को जैसे ही कोई ऑटो दिखती सभी एक साथ उसमे बैठने के लिए दौड़ पड़ते, पर सीट मिलती सिर्फ़ तीन लोगों को। इस बैठने की आपाधापी मे लोग ऑटो में बैठने के लिए बार-बार अपनी छतरी बन्द करते जिससे वे भीग जाते पर ऑफिस टाइम पर पहुँचना होता है जिसकी वजह से लोग भीगने की फिक्र तक नहीं करते। शहर तो ऐसी जगह हो गयी थी जहाँ रिश्ते बाद में नौकरी पहले। सबको भागते-दौड़ते देख मैं हैरान उधेड़ बुन में पड़ गया कि क्या पैसों की ज़रुरत इतनी बढ़ गयी है?             
                 मैं ऑफिस अक्सर देर से ही पहुंचता सो आज भी ....| यह मेरा पहला जॉब था। यहीं पर मैने समाज के आचरण को नज़दीक से समझा। मेरे जैसे लोगों को ऐसे जगह काफी कुछ बर्दास्त करना पड़ता है। पर अब बाल की खाल निकलने की कोई आवश्यकता नहीं थी। आज भी मैं अन्य लोगों से बराबर दूरी बनाकर अपने फाइलों में नज़रे गड़ाए हुये था। इस फ़ाइल का काम पूरा हो जाने पर मैं दूसरी फाइल लेने केबिन से बहार निकला तो मैनेजर की केबिन के बहार एक महिला जो कि ३० वर्ष के आस-पास रही होगी, इंटरव्यू के लिए आयी थी। चेहरा गंभीर था, घरेलू लग रही थी और मंगलसूत्र से जान गया कि वह शादी-शुदा भी थी। फिर मैं फाइल लेकर अपनी जगह पर टिक गया। दोपहर के खाने के वक़्त जब निकला तब भी वह वहीँ नज़र आयी। मुझे याद आया कि जब मै इंटरव्यू के लिए आया था तब मुझे भी ऐसे ही शाम तक बिठा रक्खा था। मैं जब शाम को घर जाने के लिए निकला तो वह नहीं दिखी, शयद घर जा चुकी थी। 
     
         आज भी सबके बाद ही ऑफिस पहुंचा। वह औरत पहले से ही मैनेजर के केबिन के बाहर बैठी हुई थी। मतलब साफ़ थ कि वह अब यहीं काम करने वाली है। लगभग ग्यारह बजे थे तभी हमारे मैनेजर शुकलाजी उसे लेकर हमारे एकाउंट्स डिपार्टमेंट मे पहुंचे। हमारे सर मि. प्यारेलाल से और हम सभी से मिलवाया और काम समझाने के लिए कहकर चले गये। हमारे प्यारे प्यारेलाल जी को पता था कि यहां जगह कम है और एक्स्ट्रा कुर्सी भी नहीं है फिर भी उसे बैठने के लिए कहा। उस महिला ने नज़र घुमाकर देखा कही कोई चेयर नहीं थी, फिर भी संकोच वश कुछ न बोली और कड़ी रही। प्यारेलालजी इस तरह की तुच्छ हरकतों को करके ओछी हंसी के आदि थे। पर वह महिला इससे अनभिज्ञ थी इसलिए खड़ी रह गयी. प्यारेलालजी इस जगह पर ८ सालों से डटे थे इसलिए वे हर किसी कि चुटकी लेने में न कतराते भले ही वह उसे नीचा दिखने के लिए हो। इधर-उधर नज़र दौड़ाई और पिउन को एक कुर्सी अन्दर लाने के लिए  कहा। जब तक कुर्सी आती उन्होने मुझसे कहा कि रितेश इनको नाईवाली कंपनी के बारे में बता दो कहकर अपने काम में लग गये। मैं कभी  व्यक्ति  के बारे में सोचता कि यह आदमी बेवकूफ़ तो होगा नहीं, चालक ज़रूर होग। इस केबिन मे बैठने की जगह देने पर बाकी लोगों की काम करने में बड़ी दिक्कत होती फ़िर भी जैसे-तैसे सभी ने एडजस्ट कर लिया।
             यह ऑफिस लोगों की गाली-गलौच से भरा होता था। जहां मालिक से लेकर साधारण कर्मचारी भी औरोतों कि मौजूदगी में भी बेपरवाही से भद्दी गालियां बक देता। इस आचार को वे अपने काम का हिस्सा बताते, कहते कि ड्रिवेरों को जब-तक गाली न दो उनकों बात समझती ही नहीं। मैं समझ नहीं सका कि समाज पढ़-लिख कर शिक्षित हो रहा है या जाहिल! ऐसे ही माहौल में हमारी बात-चीत शुरु हुई। मनीषा मैडम बिल्कुल साधारण और घरेलू स्वभाव की थी। मैं हमेशा उसकी मदद करता क्योंकि इस कंपनी में मदद माँगना मतलब अपने काम में और वक़्त बर्बाद करना। मैं हमेशा लड़कों के साथ खाना खाया करता था पर उनके साथ मन नहीं करता था। इसलिए सबके बाद खाना शुरू कर दिया। एक दिन पता चला कि मनीषा मैडम भी देर से और अकेले ही खाया कराती थी। चालो मैडम कल से मैं भी आप के ही साथ खाया करुंगा। अगले दिन जब हम खाना खाने बैठे तो उसने पूछा कि क्या यहाँ से फ़ोन कर सकती हूँ। हाँ कर लो पर जयादा लम्बी नहीं- मैंने कहा। उसने फोन लगाया और बातें शुरु की- "हैलो, नीतू है क्या?  ज़रा उसे फोन देना। नीतू क्य कर रही हो, ठीक से हो न? खाना खाई य नहीं? क्यों, देर से क्यूँ जल्दी जल्दी ख लेन था न? पूरा खाई हो न? और कैसी है, अगर नींद आएगी तो सो लेना। चल ठीक है फोन रखती हूँ।" अब उसके फोन रखने के बाद मेरे मन में प्रश्नों के बादल छाने लगे। ये मेरे अन्दर का स्वाभाविक कौतुहल था जो की प्रशनों  को जन्म दे रहा था। फिर सोचा पूछूँ कि अभी हममे इतनी जान-पहचान नहीं है तो रहने दूँ अभी। शायद पूछ ही लूँ इसमे हरज हि क्या, आखिर साथ में ही काम करते है, तो इतनी बात-चित तो हर कोई करता ही है। आखिर मेरे मन में कोई गलत भाव तो है नहीं।"आपकी बेटी है ना, कहा पर है वो?- मैंने पूछा। "हाँ मेरी बेटी है तीन साल की। उसे बेबी सिट्टिंग्स मे छोड़ कर आती हूँ।"- कहकर उसका गल रुंध गया। अब मेरे मन की बैचेनी बढ़ गयी। भांप तो गया था कि घर पर बच्चे को देखने वाला कोई न होगा और इन्हे नौकरी करनी है तो यही होना है। आज-कल तो नौकरी पेशा लोगों को तो यह तकलीफ उठानी ही है। अब इसके पीछे कारण भौतिक खर्च बढ़ना या औरतों का अपने पैरों पर खड़े होने की आशा या फिर मेरा घर में वक़्त नहीं कटता कुछ टाइम पास भी हो जायेगा और अपनी पॉकेट मनी भी आ जायेगी। आखिर कौन अपनी हर छोटी-छोटी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये माँगने जाये उसपर भि मिले या न मिले। पुरुष भी हैं ऐसे जो अपने लिए कुछ भी खर्च कर लेते है पर बीवी जब कुछ अपने लिए खरीदने जाये तो पतिदेव को नुकसान-फायदे याद आने लगते हैं और उपदेश पुरस्कार स्वरूप दे देते है। ऊपर के दोनों सन्दर्भ में ऐसी बिवियों के और पतियों के जीवनसाती प्राय: ऐसे नहीं होते पर होते देखना पड जाता है। इन बातों में से कौन-सी अवस्था इनकी स्थिति पर सही बैठती है, इस कारण थोड़ा रुककर जब मनीषा शांत हुई तो पूछा - आखिर बात क्या है? मनीषा ने विस्तार से बताना शुरु किया -"मेरे हसबैंड एक कंपनी में मेकेनिक थे। कंपनी अच्छी थी और पगार भी अच्छी मिल रही थी। उस नौकरी के आधार पर एक रूम भी लोन पर ले लिया था। कुछ महीनों के बाद खबर आने लगी कि कंपनी का मालिक किसी फिल्मीं हेरोइन के पीछे पैसे उड़ा रह है। जिसके चलते उसकी एक फिल्म में ढेर सारा पैसा भी लगा दिया पर फिल्म बनी नहीं और सार पैसा डूब गया। इसका असर कंपनी पर पड़ा जिससे कंपनी बन्द हो गयी। अब हमें अपना घर बेचकर लोन का पैसा भरना है इसलिए मैं जॉब कर रहीं हूँ और बच्ची को सुबह बेबी सिटिंग्स में छोड़कर आती हूँ।" कहते-कहते उसकी गलों पर आँखों से पानी की लकीरें बह चली। मै अपनी सोच पर लज्जित हुआ कुछ न कह सका बिन उसके चेहरे को देखे ही बातें करने लगा। कुछ हफ्तों के बात मैंने नौकरी छोड़  दी थी। एक बार उसके बुलाने पर मैं उसके घर गया था। उसके बाद आज तक कोई बातचीत नहीं हो पयी।
                                      (२)

             
मेरे पास नौकरी नहीं थी। पर कई कोशिशों के बाद एक नौकरी मिली। इस बार ऑफिस घर के पास ही था। केवल १५ मिनटो की दूरी पर। अब मैं ऑफिस टाइम से या टाइम से पहले पहुचता था। कुछ ही दिनों बाद दोस्तों के साथ पिकनिक कि प्लानिंग हो रही थी। यह प्लानिंग तो काफी पहले की थी पर जइब पर था नहीं और पैसे नदारद थे तो अटकी पड़ी थी। इस बार हमने २ दिनों की प्लानिंग की ताकी एक ही दिन में भागना न पड़े। सो सभी ने उज्जैन जाने का निश्चय किया। जब हम सुबह उज्जैन पहुंचे तो काफी अलग-सी अनुभूति हुई। हर तरफ़ जैसे शिव जी महाकाल के रूप में विराजमान हों। यहां आय का मुख्य साधन महाकालेश्वर क मन्दिर ही था। द्वादस ज्योतिर्लिंगों मे से  यह एक थी। महाकाल शब्द यहां का सबसे प्रचलित शब्द था। यहाँ के रहिवासी फोन भी करते य उठाते तो "जय महाकाल" से ही शुरुआत करते। यह एक नयी अलोकिक, अद्भुत और भक्ति में सराबोर जगह थी। हम सभी ने पहुंचकर पहले धर्मशाला ढूंढी,इस धर्मशाला  के ठीक पीछे क्षिप्रा नदी थी। सामान रखकर हम पहले क्षिप्रा नदी में ही स्नान किये और सीधे महाकाल के दर्शन के लिए पहुंचे। संयोग से ज्यादा वक़्त नहीं लगा और दर्शन हो गए। जब बाहर निकले तो देखा काफी लोग दर्शन के लिए खड़े थे। बाहर बाजार में एक खास बात थी कुछ मुसलमान भाई भी शिवजी की प्रतिमा एवं अन्य पूजा समाग्रो बेच रहे थे। फिर मन्दिर के प्रांगड़ से बाहर आकर हमने सोचा कि यहाँ कुछ घूमने लायक है तो लोगो से पूछताछ की तो पता चला कि उज्जैन दर्शन के लिए यहाँ सवारी भी मिलती है। तो हमने बहार आकर सवारियों से पूछना  शुरु किए और ४०० रुपये पर एक गाड़ी तय कर ली। फिर उससे वक़्त तय करके हम खाना खाकर और मन्दिर के आस-पास घूमने लगे। जब वक़्त हुआ तो हम उज्जैन यात्रा के लिए चल दिये। गाड़ीवाले ने हमें सूर्यदेवता क मन्दिर जो की किसी विशेष अक्षांश पर स्थित है, राजा भर्तृहरि कि गुफा जहा उन्होने बाबा गोरखनाथ के सानिध्य में अमर होने की तपस्या कि थी, बाबा भैरव नाथ का बंदरों से घिरा मन्दिर, वह आश्रंम जहाँ श्रीकृष्ण जी ने के शिक्षा ग्रहण की ये सारी जगह दिखाई। वहाँ से लौटकर हम धर्मशाला पर आये और खाना खाकर सो गये। सुबह फ़िर क्षिप्रा  स्नान किया और जल्द ही धर्मशाला छोड़ दिए नहीं तो अगले दिन का अतिरिक्त किराया देना पड़ता। स्टेशन पर पहुंचकर एक को खड़ा करके बाकि सब फिर घूमने लिकल पड़े। मुंबई के लिए ट्रेन आने में अभी २ घंटे का समय था। जब लौटे तो स्टेशन पर जानेवालों कि भीड़ हो चुकी थी। हमारे पास ही दो व्यक्ति एक महिला के साथ खड़े थे जिनका रिजर्वेशन हामरे पास की सीट पर ही था । एक व्यक्ति शायद उस महिला का पति था, कह रहा था –
“अपनी सीट खिड़की के पास है ज़रा संभालकर बैठना और सामान अंदर करके बैठना | अन्य कोई आए तो बैठने मत देना| गले या हाथ में की चीजे बैग में रख लो| उतरने के बाद पहन लेना|” मैंने कहा –“ अरे आप की सीट है तो आप ही बैठना कोई और नहीं बैठेगा| आप लोग उसकी चिंता ना करें| हम लोग भी अपनी ही सीट पर बैठेंगे | ” उस व्यक्ति को शायद अंजान लोगों का बीच में बोलना अच्छा नहीं लगा| ये मैं उनके देखने के अंदाज़ से समझ गया| मुझे भी महसूस हुआ कि शायद मैंने उनके बीच में बोलकर गलती की| जवाब में उन्होने कहा - “ किसी का भरोसा नहीं, कुछ होने के पहले सभी अच्छे ही होते हैं|

        ट्रेन थोड़ी देर में आ गयी सभी चढ़ने लगे| हम सभी ने अपनी-अपनी सीट देखकर सामान रख दिया और बैठ भी गये| बैठने के बाद हम आपस में बातें करने लगे की अगर लोग एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करेंगे तो कोई किसी की मदद कैसे करेगा? आखिर समाज में इतना अविश्वास कैसे हो सकता है? हमारे बस में नहीं होता किसी को सोछ को बदलना| समाज में हर रंग और मिज़ाज के लोग भरे है| हमारी बातें उयांतक तो नहीं पहुँच रही थी पर उस महिला को संशय हो रहा था की हम उन्हीं की बातें कर रहे है| ट्रैन थोड़ी देर में चल दी । मैंने मौका देख कर उस औरत से कहा -" कि आप लोग आराम से बैठ जाएँ। अगर सोने की ज़रूरत हो तो सो लीजिये। लम्बे सफ़र में हमें एक-दूसरे से सहयोग और मैत्रिपूर्ण होना चाहिये।" मैं उन लोगो को अपने साथ सहज होने के लिए इस तरह बातें करने लगा। इसपर उस औरत ने अपनी एक पुराने सफ़र की बात शुरू की। चहरे से और अंदाज़ से प्रतीत हुआ कि मुझे कुछ जवाब देने की कोशिश कर रही हो। वह मेरी तरफ़ ज़रा मुड़ी और कंधे को पीछे सीट पर टेक ली मानो सुनाने से पहले खुद को आधार देकर कहने के लिए तैयार कर रही और कहने लगी - "हम सभी परिवार सहित गाँव जा रहे थे। मैं, मेरे पती और हमारा २ साल का बेटा। खूब भींड़ थी। हमारा रिजर्वेशन था। पर डिब्बा जनरल डिब्बे की तरह खचा-खच भर हुआ था। कोई भी कहीं भी सामान रखकर बैठ गया था। न पाँव रखने की जगह और न ही कही बाहर जाने का रास्ता और उसी में एक हमारा छोटा बच्चा । जब तक गाड़ी स्टेशन से नहीं निकल जाती है लोगो का सामान रास्ते में ही लेकर जगह ढूढते । जिनकी सीट रिज़र्व थी वे दूसरों को अपनी जगह पर टेकने भी नहीं देते । कुछ और भी थे जो दया कर बैठने कि जगह दे देते । बड़ी परेशानी थी, बच्चा भी परेशान होकर बिलखने लगता। हमारे पास ही एक लड़का था जो लगभग १२ या १४ साल का रहा होगा । शायद उसे बैठने कि जगह न थी । काफी देर से आने -जाने वाले रस्ते के बीच में ही खड़ा था । सभी अनारक्षित और बिना टिकट वाले कहीं न कहीं टिक चुके थे । आखिर जाना तो सबको था । हमने भी उस लडके को अपने बगल में बैठने कि जगह दे दी । मैंने उस लडके से पूछा कि और भी  कोई साथ में है क्या ? वह बताया कि दो लोग और हैं । उनका टिकट कंफर्म नहीं हुआ वेटिंग में है इसीलिए सभी इधर-उधर जगह देखकर बैठे होंगे । साथ रहने पर सभी एक जगह नहीं बैठ पाते । इसलिए अलग हो गए और अन्त में गोरखपुर स्टेशन में ही मिलेंगे । हमने उसे कहा कि बेटा ठीक है यहीं बैठ जाओ समान उपर कि सीट पर रख लो वो सीट हमारी ही है । फिर उसने बताया कि हम सबका सामान एक ही बैग में चाचाजी के पास ही है । थोड़ी ही देर में शाम हो गयी । सभी लोग एक-दूसरे से बातें करते जा रहे थे । हर कोई किसी न किसी के गांव का, जिल्ला का या फिर आस-पास में जान-पहचान लिकलने कि कोशिश कर रहा था । हम सफ़र कि भीड़-भाड़ में जगह रिज़र्व होने की वजह से संतुष्ट थे पर हमारा बच्चा बेचैन हो-होकर बिच-बीच में रो दिया करता था। एक तो उसे खड़े होकर घूमना मुशिकल हो रहा था । वह लड़का भी कई बार उसे खड़े होकर घुमा दिया करता था । रात के आठ बज गये थे । लोग अपना खाना खाने की शुरुआत करने लगे थे । हमने उस लडके से कहा कि तुम भी हमारे साथ ही खा लो । वह नहीं माना और यह कहकर चल गया की मै चाचाजी के पास ही जाकर खा  लूंगा । हमने भी ध्यान नहीं दिया कि उसे तो पता ही नहीं कि उसके चाचाजी कहाँ बैठे हैं, तो कहाँ उन्हे ढूढता । थोड़ी देर में वह वापस आ गया। वह हमारे बच्चे के साथ काफी घुल-मिल गया था । जब वह बच्चे को गोद में उठा लेता तो वह जल्दी चुप हो जाता था । १० बजे तक हमने भी सोने के लिए बिच वाली सीट उपर कर दी थी । वह लड़का दो सीटों के बीच में निचे ही चादर बिछाकर लेट गया । काफी देर तक बच्चे को सुलाने के बाद मैं भी सो गयी । लाईटें बद कर दी गयी । सभी चैन से सोने लगे । रात को दो-तीन बार बच्चा रोया तो दूध पिलाकर फ़िर सुला दिया और मै भी सो गयी । सुबह ६ बजे के बाद ही नींद खुली । कुछ लोग उठ गये थे । मैं भी उठकर पैर लटकाकर बैठ गयी पर देखा कि  वह लड़का वहां नहीं था ।  मैंने सोचा कि शायद अपने चाचाजी के पास गया होगा । नींद की वजह से कुछ सेकंड के लिए मुझे बच्चे का ख्याल ही नहीं था । मेरे पास बच्चा नहीं दिखा तो मैंने अपने पती से पूछा कि मुन्ना को अपने पास ही सुलाएं है क्या? मेरी तो नींद लग गयी थी मुझे पता ही नहीं कब आप उसे उठाकर अपने पास उठकर ले गए । मेरे पूछने के एक मिनट के बाद ही वे  अचानक उठ बैठे और बोले वह लड़का कहा हैं ?  पर मैंने माथे को सिकोड़कर उअनके मुह के पास जाकर बोली बच्चा कह हैं ? हम दोनों एक दूसरे को देखने लगे। मई सन्न रह गयी मेरे पति पूरे डिब्बे में लोगो से पूछने लगे पर उसका कोई पता नहीं। फिर दुसरे डिब्बों मे भी जाकर काफी समय तक ढूंढते रहे । पर उसका कोई पता नहीं । वह रात में कब ट्रैन से उतर गया किसीको कुछ खबर नहीं । तबसे आज तक आज तक हमारा मुन्ना लापता ही है । शायद अब  मिलने की उम्मीद भी नहीं ।"  औरत कह रही थी पर आंसू उसके पती के चेहरे की लकीरों मे भूले रास्ते कि तरह समा गयी । 
                     जब हम अपने स्टेशन पौंछे तो मैंने वहैं से घर जाने के लिए शेयरिंग ऑटो पकड़ ली । मैं तीन लोगो की सीट मे बीच में डूबकर बैठा हूँ उर सामने कि सीटों पर तेज बारिश की बौछारों मे बनती और बिगड़ती ढेर सारी पानी की लकीरौन मे दोनो लकीरे भी आयी और बह गयी । 

शुक्रवार, 30 मई 2014

सूखे पत्ते


कब कोई आया पता न चला,
जाने का गम भुला न सका।
पते का पता ना मिला, फिर भी पूछता ही रहा,
उम्र थक गई थी और पानी के किनारे अकेला ही बैठा रहा।
बंद और खुली नज़रों से दूर तक देखता ही रहा,
चेहरों के बीच अपना चेहरा याद ना रहा।
बस खुद को उनकी आंखो मे देखता ही रहा।
तुम्हारी याद भी आँसू बहाकर थक गई है,
रोने के लिए भी नमी को तरसता रहा।
जब साथ छूटा तो मन उसके मन को टटोलता रहा,
कैसे बीतेंगे दिन उसके, रातो को भी सोचता रहा।
जब अलविदा हुआ तो नज़रें तुम्हारी झुकी ही रही,
न समझ सका न पूछ सका, भरी आखों से सवालों को थामे रहा।
क्यू था, क्या था, था भी या कुछ भी न था,
उनसे सवालो का जवाब मांगता ही रहा।
जब मुलाक़ात हुई तब सदियों से रुका बांध फूट पड़ा था,
पर अब उनकी हलचल मे मेरा कोई नशा ही ना रहा।
मै बीती तारीख मे कहीं छूटा हुआ पड़ाव सा खड़ा रहा,
अबकी बार आने का पता तो चला, पर छूट जाने का मलाल न रहा।
गर पास होते ना दे पाते उन्हे, जो आज तक उनके दामन मे आता रहा,
रौनक है आज उनके आशियाने पर, जबकि मै घोसले का तिनका अभी ढूँढता ही रहा।   
बस खुशी ही तो देना चाहा था,
फिजूल ही पतझड़ के बेजान पत्तों को जीवन का भाग समझता रहा। 
                        

.................राकेश कृत

गुरुवार, 8 मई 2014

आज भी …वही



सालों से कदम आगे बढ़ते रहे,
पर दिल कहीं थम-सा गया।         

घर वही, घर की बालकनी भी वही,
सड़के भी वही, सडकों पर मुड़ती गली भी वही,
पर सुबह से दोपहर तक धूप, और शाम को तेज़ हवा का आना बंद हो गया|

आज हर ईमारत में बदलाव और नयापन था,
पर मै उसी पुरानी बस्ती को पूछता रह गया ।


स्कूल की सिकुड़ी शर्ट में, कई बार हाँथों से सिल चुकी खाली जेब थी ।
और पैंट में चार आने वाली जेब थी, हम सभी ऐसे ही थे,
कापी-किताबें कभी पल्स्टिक की थैली में तो कभी असली स्कूल बैग में होती।


बचपन में जहां गुल्लीडंडा, भवरा और गोटियां खेली,
वहा अब सोसाइटी का बॉर्डर लग गया।


पहले कभी गर्मी में पंखे को नहीं ढूंढता, पर अब AC मे भी उमस होने लगी है।
बाबूजी की सायकल की डंडी पर बैठकर हवा से बातें की थी,
अब कार की AC में हवा भी चुप थी और मै भी खामोश था ।



हाथ में घडी नहीं थी पर दोपहर का खाना घर पर ही होता,
अब महँगी घडी भी दोपहर खाना शाम को याद दिलाती है ।
और शाम तक डिब्बे की रोटी तह में मुड़ी, सिकुड़ी और बासी हो जाती है ।


एक अनजान चेहरे की नज़रों ने मेरी नज़रों से पहली ही बार में अपना रिश्ता पहचान लिया था,
जिसके पहले स्पर्श से अपनी आँखों को मूँद लिया था, कभी लब ना जो बोल सके पर मन समझ गया था ।

                                                       



जिसे खोने के बारे में कभी सोचा न था, न जाने कब दिल में छिपकर बैठ गया।
फिर भी आस थी,और उम्मीद है लेकिन वक़्त वापस नहीं आनेवाला,

न ही बदलाव की पुरानी मंज़िल ढहने वाली।



पुरानी मीठी यादों को नए जीने के सहारों में हर कोई भूलाने तो चला,

जब दोपहर की वक़्त में अकेला हुआ तो बीती हुई, पुरानी और दर्द देनेवाली यादों के रिशों का ही याद आ गया।

लोग तो हर वक़्त मुझे ही समझाते रहे, पर उनका खुद को ही समझना रह गया।



मेरी हर चीज़ नयी-सी थी, शरीर का आकर अलग था,
जगह अलग सी दिख रही थी और पहनावा भी बदल गया था,


पर सूरज वही, धुप वही, शाम वही, हवा वही,
धरती वही और रात को तालाब के किनारे अँधेरे में चमकते तारे वही,
मुझमे ऐसा क्या दिखा की मैं लोगो को पुराना-सा लग गया।




छोडो दो अब जाने दो मुझे, अब मैं ज़रा आखें बंद कर लू,
ज़रा बंद आँखों में पुरानी तस्वीर को साफ कर लूँ,
बीती ही हुयी, पर अपने हिस्से की ख़ुशी को ज़रा याद तो कर लूँ,


अब जाकर महसूस हुआ कि.. मेरी आत्मा भी वही है पुरानी,

...तभी तो मै भी वही पुराना रह गया।