शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

पानी की लकीरें (कविता)


आज बारिश की बूद ने फिर याद दिलायी,और पानी की लकीर कब आँसू बन गए। 

तेज़ बारिश होती रही, तन भीगता रहा, आँखों में पुरानी तस्वीर साफ़ होते गए।  

जब एक छाते मे सिमटे भीग रहे थे, और भीगे लिबाज़ तन से लिपटे हुए थे,

पूरी दुनिया ही उस छाते में समाई थी, साँसे गर्म थी जबकि भीगे बदन थे।

दोनों करीब थे बस हाथों को हाथों का स्पर्श था, इस करीबी से ही दिल का सुकून था।

बारिश के छींटे चेहरे पर हमारे बिखरे पड़े थे,

भीगा वक़्त भी चला जा रहा था पर हम थम गए थे।

हम जब तक रहे खोये रहे, अब तो वक़्त मे ही कही खो गए।

आज हूँ मैं खड़ा बस देखता ही रहा, बारिश थी हो रही पर आज हम साथ न थे,

तन भीगता ही रहा आंखे रोती रही, पर आँसू पानी की लकीरों मे खोते गए।

.......राकेश कृत........

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