शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

भीख


फटी साड़ी से तन ढका था,
उसी साड़ी के आँचल रहित छोर को हथेली पर थामा था,
पेट रहित उदार की भूक के लिये हाथ पसारा था।

सिर के रूखे बालों को देखा,
सड़को की रेत से उनको सजा रक्खा था,
तेज हवा का झोका भी उनको लहरा न पाता था,

उसके बिखरे बरतन को देखा,
चार ही तादाद थे और अनाज कोई दाना भी न था,
न घर जैसी कोई चीज़ थी, ना रसोई का ठिकाना था।
न प्यार की झलक थी, न सपनों का फसाना था।
ना उचाई को पाना था, ना गिरने का कोई बहाना था।
चौधियाई आखों से हर हर किसीकों ताक रही थी,
उम्मीद हर कसी से थी, पर पाना शायद कुछ से ही था,
दो पैसों की ज़रूरत थी, दो पैसों की ही उम्मीद थी,
दो पैसों की ही भूक थी और दो पैसों से ही प्यार था।
   मेरे तो चार पैसे भी थे
              फिर भी क्यों कुछ और भी पाने का दीवाना था।

राकेश कृत -----



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