पर दिल कहीं थम-सा गया।
घर वही, घर की बालकनी भी वही,
सड़के भी वही, सडकों पर मुड़ती गली भी वही,
पर सुबह से दोपहर तक धूप, और शाम को तेज़ हवा का आना बंद हो गया|
आज हर ईमारत में बदलाव और नयापन था,
पर मै उसी पुरानी बस्ती को पूछता रह गया ।
स्कूल की सिकुड़ी शर्ट में, कई बार हाँथों से सिल चुकी खाली जेब थी ।
और पैंट में चार आने वाली जेब थी, हम सभी ऐसे ही थे,
कापी-किताबें कभी पल्स्टिक की थैली में तो कभी असली स्कूल बैग में होती।
बचपन में जहां गुल्लीडंडा, भवरा और गोटियां खेली,
वहा अब सोसाइटी का बॉर्डर लग गया।
पहले कभी गर्मी में पंखे को नहीं ढूंढता, पर अब AC मे भी उमस होने लगी है।
बाबूजी की सायकल की डंडी पर बैठकर हवा से बातें की थी,
अब कार की AC में हवा भी चुप थी और मै भी खामोश था ।
हाथ में घडी नहीं थी पर दोपहर का खाना घर पर ही होता,
अब महँगी घडी भी दोपहर खाना शाम को याद दिलाती है ।
और शाम तक डिब्बे की रोटी तह में मुड़ी, सिकुड़ी और बासी हो जाती है ।
एक अनजान चेहरे की नज़रों ने मेरी नज़रों से पहली ही बार में अपना रिश्ता पहचान लिया था,
जिसके पहले स्पर्श से अपनी आँखों को मूँद लिया था, कभी लब ना जो बोल सके पर मन समझ गया था ।

जिसे खोने के बारे में कभी सोचा न था, न जाने कब दिल में छिपकर बैठ गया।
फिर भी आस थी,और उम्मीद है लेकिन वक़्त वापस नहीं आनेवाला,
न ही बदलाव की पुरानी मंज़िल ढहने वाली।
पुरानी मीठी यादों को नए जीने के सहारों में हर कोई भूलाने तो चला,
जब दोपहर की वक़्त में अकेला हुआ तो बीती हुई, पुरानी और दर्द देनेवाली यादों के रिशों का ही याद आ गया।
लोग तो हर वक़्त मुझे ही समझाते रहे, पर उनका खुद को ही समझना रह गया।
मेरी हर चीज़ नयी-सी थी, शरीर का आकर अलग था,
जगह अलग सी दिख रही थी और पहनावा भी बदल गया था,
पर सूरज वही, धुप वही, शाम वही, हवा वही,
धरती वही और रात को तालाब के किनारे अँधेरे में चमकते तारे वही,
मुझमे ऐसा क्या दिखा की मैं लोगो को पुराना-सा लग गया।
छोडो दो अब जाने दो मुझे, अब मैं ज़रा आखें बंद कर लू,
ज़रा बंद आँखों में पुरानी तस्वीर को साफ कर लूँ,
बीती ही हुयी, पर अपने हिस्से की ख़ुशी को ज़रा याद तो कर लूँ,
अब जाकर महसूस हुआ कि.. मेरी आत्मा भी वही है पुरानी,
...तभी तो मै भी वही पुराना रह गया।

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