ये चेहरा ही है या रंगीन परछाई कोई,
सूना है चेहरा जैसे मीठा पर अधूरा सपना कोई।
किसकी चाहत है जो मन को बांधे है,
कहीं होश ही न खो देना, जैसे अपना ही खोया
हुआ दिल फिर पाया हो कोई।
बिखरी है हालत खुद की सुध ही न कोई,
समेट लो अपने दामन को,
कहीं ये आता वक़्त ही न बना दे इन्हे यादों का बीता पल फिर कोई।
नज़रें हटा लो क्यूँ बनी हो मूरत कोई,
क्यूँ भूल बैठे हो खुद को, तुम हकीकत हो
ना के ख्वाब कोई।
ना इस खामोशी से चाहो खुदा की इबादत की तरह,
ये मेरी वफा का नशा है उसपर तुम खुद भी नशा हो कोई।
---राकेश कृत
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