गुरुवार, 4 सितंबर 2014

गरीब का दान

गरीब का दान-


साहूकार दान से नाम कमाते,

हमारे ही धन को दान बनाते,

फिर चर्चे उनको ही दानवीर का दर्जा दिलाते,

साहेब हम क्या जाने? हम तो गरीब आदमी है।

अपनी पुरानी कमीज़ भीख मे दे दी,

चार पैसो की कमाई से एक आश्रिता को दे दी,

हमारा नाम तो कागज़ पर क्या किसी लब से भी ना सुनाई दी,

साहेब हम क्या जाने? हम तो गरीब आदमी है।

आश्रिता के रिश्ते भी ज़रूरत भर के,

उनके अपने भी हमे न चाहे जी भर के,

वक़्त बदलते ही हमसे दूर ही है पास हो करके,

क्या बदला हम क्या जाने? हम तो गरीब आदमी है।

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