सुनो न.... ईन जाते हुये लम्हों की कड़ी अपनी ज़िंदगी के साथ
यही छोड़े जाती हूँ,
इस लम्हे के उसपार किसी और की ज़िंदगी बनाने जाती हूँ।
हमारे सफर को रोक लो, तुम्हें चलना है अब मेरे बिना…..
खुद की सुध जिन बाहों से वापस ले जा ना सकी,
उन बाहों को समेट लेना बस थोड़ी सी ही जगह की उम्मीद से पास
तुम्हारे छोड़े जाती हूँ।
मुझे अपने सफर पर चलना है अब तेरे बिना......
बेसुध ये जिस्म लेकर सजाके बैठी हूँ दुनिया की महफिल में,
इस सजावट की तेज़ रौशनी भी जिसे रौशन न कर सकी उस अंधेरे को
दिल में लिए जाती हूँ।
इस अंधेरे में प्यार का दिया अब जल न सकेगा हमारे बिना.....
मैं बिक चुकी हूँ कुछ रिशों के हिसाब मे, पर मैं कोई सौदा नहीं अमानत याद
की दिये जाती हूँ।
मेरे दिल के तुम खुदा थे अब समझी हूँ, जब रही हूँ तेरे बिना….

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