शुक्रवार, 30 मई 2014

सूखे पत्ते


कब कोई आया पता न चला,
जाने का गम भुला न सका।
पते का पता ना मिला, फिर भी पूछता ही रहा,
उम्र थक गई थी और पानी के किनारे अकेला ही बैठा रहा।
बंद और खुली नज़रों से दूर तक देखता ही रहा,
चेहरों के बीच अपना चेहरा याद ना रहा।
बस खुद को उनकी आंखो मे देखता ही रहा।
तुम्हारी याद भी आँसू बहाकर थक गई है,
रोने के लिए भी नमी को तरसता रहा।
जब साथ छूटा तो मन उसके मन को टटोलता रहा,
कैसे बीतेंगे दिन उसके, रातो को भी सोचता रहा।
जब अलविदा हुआ तो नज़रें तुम्हारी झुकी ही रही,
न समझ सका न पूछ सका, भरी आखों से सवालों को थामे रहा।
क्यू था, क्या था, था भी या कुछ भी न था,
उनसे सवालो का जवाब मांगता ही रहा।
जब मुलाक़ात हुई तब सदियों से रुका बांध फूट पड़ा था,
पर अब उनकी हलचल मे मेरा कोई नशा ही ना रहा।
मै बीती तारीख मे कहीं छूटा हुआ पड़ाव सा खड़ा रहा,
अबकी बार आने का पता तो चला, पर छूट जाने का मलाल न रहा।
गर पास होते ना दे पाते उन्हे, जो आज तक उनके दामन मे आता रहा,
रौनक है आज उनके आशियाने पर, जबकि मै घोसले का तिनका अभी ढूँढता ही रहा।   
बस खुशी ही तो देना चाहा था,
फिजूल ही पतझड़ के बेजान पत्तों को जीवन का भाग समझता रहा। 
                        

.................राकेश कृत

गुरुवार, 8 मई 2014

आज भी …वही



सालों से कदम आगे बढ़ते रहे,
पर दिल कहीं थम-सा गया।         

घर वही, घर की बालकनी भी वही,
सड़के भी वही, सडकों पर मुड़ती गली भी वही,
पर सुबह से दोपहर तक धूप, और शाम को तेज़ हवा का आना बंद हो गया|

आज हर ईमारत में बदलाव और नयापन था,
पर मै उसी पुरानी बस्ती को पूछता रह गया ।


स्कूल की सिकुड़ी शर्ट में, कई बार हाँथों से सिल चुकी खाली जेब थी ।
और पैंट में चार आने वाली जेब थी, हम सभी ऐसे ही थे,
कापी-किताबें कभी पल्स्टिक की थैली में तो कभी असली स्कूल बैग में होती।


बचपन में जहां गुल्लीडंडा, भवरा और गोटियां खेली,
वहा अब सोसाइटी का बॉर्डर लग गया।


पहले कभी गर्मी में पंखे को नहीं ढूंढता, पर अब AC मे भी उमस होने लगी है।
बाबूजी की सायकल की डंडी पर बैठकर हवा से बातें की थी,
अब कार की AC में हवा भी चुप थी और मै भी खामोश था ।



हाथ में घडी नहीं थी पर दोपहर का खाना घर पर ही होता,
अब महँगी घडी भी दोपहर खाना शाम को याद दिलाती है ।
और शाम तक डिब्बे की रोटी तह में मुड़ी, सिकुड़ी और बासी हो जाती है ।


एक अनजान चेहरे की नज़रों ने मेरी नज़रों से पहली ही बार में अपना रिश्ता पहचान लिया था,
जिसके पहले स्पर्श से अपनी आँखों को मूँद लिया था, कभी लब ना जो बोल सके पर मन समझ गया था ।

                                                       



जिसे खोने के बारे में कभी सोचा न था, न जाने कब दिल में छिपकर बैठ गया।
फिर भी आस थी,और उम्मीद है लेकिन वक़्त वापस नहीं आनेवाला,

न ही बदलाव की पुरानी मंज़िल ढहने वाली।



पुरानी मीठी यादों को नए जीने के सहारों में हर कोई भूलाने तो चला,

जब दोपहर की वक़्त में अकेला हुआ तो बीती हुई, पुरानी और दर्द देनेवाली यादों के रिशों का ही याद आ गया।

लोग तो हर वक़्त मुझे ही समझाते रहे, पर उनका खुद को ही समझना रह गया।



मेरी हर चीज़ नयी-सी थी, शरीर का आकर अलग था,
जगह अलग सी दिख रही थी और पहनावा भी बदल गया था,


पर सूरज वही, धुप वही, शाम वही, हवा वही,
धरती वही और रात को तालाब के किनारे अँधेरे में चमकते तारे वही,
मुझमे ऐसा क्या दिखा की मैं लोगो को पुराना-सा लग गया।




छोडो दो अब जाने दो मुझे, अब मैं ज़रा आखें बंद कर लू,
ज़रा बंद आँखों में पुरानी तस्वीर को साफ कर लूँ,
बीती ही हुयी, पर अपने हिस्से की ख़ुशी को ज़रा याद तो कर लूँ,


अब जाकर महसूस हुआ कि.. मेरी आत्मा भी वही है पुरानी,

...तभी तो मै भी वही पुराना रह गया।