कब
कोई आया पता न चला,
जाने
का गम भुला न सका। पते का पता ना मिला, फिर भी पूछता ही रहा,
उम्र थक गई थी और पानी के किनारे अकेला ही बैठा रहा।
बंद और खुली नज़रों से दूर तक देखता ही रहा,
चेहरों के बीच अपना चेहरा याद ना रहा।
बस खुद को उनकी आंखो मे देखता ही रहा।
तुम्हारी याद भी आँसू बहाकर थक गई है,
रोने के लिए भी नमी को तरसता रहा।
जब साथ छूटा तो मन उसके मन को टटोलता रहा,
कैसे बीतेंगे दिन उसके, रातो को भी सोचता रहा।
जब अलविदा हुआ तो नज़रें तुम्हारी झुकी ही रही,
न समझ सका न पूछ सका, भरी आखों से सवालों को थामे रहा।
क्यू था, क्या था, था भी या कुछ भी न था,
उनसे सवालो का जवाब मांगता ही रहा।
जब मुलाक़ात हुई तब सदियों से रुका बांध फूट पड़ा था,
पर अब उनकी हलचल मे मेरा कोई नशा ही ना रहा।
मै बीती तारीख मे कहीं छूटा हुआ पड़ाव सा खड़ा रहा,
अबकी बार आने का पता तो चला, पर छूट जाने का मलाल न रहा।
गर पास होते ना दे पाते उन्हे, जो आज तक उनके दामन मे आता रहा,
रौनक है आज उनके आशियाने पर, जबकि मै घोसले का तिनका अभी ढूँढता ही रहा।
बस खुशी ही तो देना चाहा था,
फिजूल ही पतझड़ के बेजान पत्तों को जीवन का भाग समझता रहा।
.................राकेश कृत

