सोमवार, 27 सितंबर 2010

यादों की उम्र:





यादों की उम्र:

सालों से चोरों की तरह छुपाकर रक्खी थी, किसी को भी दिखाई ना थी। 
आज एक शाम उनकी याद लेकर आयी थी। 

 साल-दर-साल हर पल की याद को दिमाग में संजो लेता था,
जब दिमाग जिंदगी के कामों में उलझा तो उनको दिल के अँधेरे में फेंक देता था ।

आँखों तले जब अँधेरा होता तो उस अंधेरे की याद आ जाती, याद आती तो उन अंधेरों से याद भी निकल आती,
अँधेरे के बावजूद भी यादें बिलकुल साफ़ नज़र आती । 

दिल न मानता और दिमाग ना सोचता की इन यांदों की हिफाज़त से क्या हासिल होता,
इसलिए उजालों से पहले उन्हें दूसरों की नज़रों से बचाकर फिर दिल के अँधेरे में छुपा लेता। 


दिन महीने और साल गुजरते चले गये जो पाया और जो खोया उसी अँधेरे में खोंसता चला गया,
कभी यांदो को इबारत का रूप भी दिया, कुछ खून से कुछ स्याही से लिखा फिर आँखों से धोता भी चला गया। 

कभी-कभी खुद को ही सबूतों की तरह पन्नों को खोलकर याद दिलाता। 

कई दफा दुनिया के हसीं लोगो ने यादों से जुडी भावनाओं को मूल्यवान बताया,
धैर्य रखकर इंतज़ार करने का रास्ता भी दिखाया। 


अब सालों गुजरने पर भी इंतज़ार ख़त्म न हुआ, धैर्य से बस यादों में राहों को ही खोजता रहा ।

अब लगने लगा कि जिसे पाना मुमकिन ही न था वो आएंगे कैसे, जिनकी तरफ रस्ता ही मुमकिन न था उस तरफ जाते कैसे?

जो हासिल करने के इंतज़ार में था ऐसी तो कोई मंज़िल ही ना थी,
वक़्त सालों से गुज़र रहा था पर आज एहसास हुआ कि मेरी उम्र भी गुज़र रही थी।

आज मेरा बदला हुआ वक़्त ही मुझे समझ रहा था, मै कभी तुम्हारा हो ही नहीं सकता मै तो पराया था।


पर कैसे बताऊँ कि हमारा नहीं भावनाओं का मेल था, पर क्या।… मुझे ये मेरी भावनाओं का भ्रम था?

अब न कोई इंतज़ार था न कोई उम्मीद थी, तो धैर्य रखता किसके लिए। 

बस एक मन की भवना है जो यांदों को मज़बूती से जकडे हुए है,
दूर अंधेरों में वही दो आँखें चमक रही हैं। 

चलो इन यादों में ही पूछ लूँ, … बताओ ना, क्या मैं भी तुम्हारी यादों में हूँ?