मैं एक सपना देखा करता था कि एक बार हवाई जहाज देखूं, पर पता नहीं भगवान ने कब सुन ली और इस वक़्त मैं एअरपोर्ट की साईट पर हूँ. जब मैं पहली बार यहाँ आया तो एक हफ्ते तक तो मुझे कुछ काम ही नहीं था सिर्फ देखने और समझने के लिए किसी न किसी इंजिनियर के साथ भेज दिया था. जब मैं पहली बार राष्ट्रीय एअरपोर्ट के टर्मिनल बिल्डिंग से आगे जहाँ से जहाज उड़ान भारती थी वहा पंहुचा तो १० मिनट तक सब कुछ निहारता रहा. मैंने कभी इतनी नजदीक से और इतने सारे जहाजो को कभी भी नहीं देखा था. कभी सोचा भी नहीं था कि देख सकूंगा.
मैंने जबसे यह नई नौकरी ज्वाइन किन थी तब पता नहीं क्यूँ लिखने का ख्याल भी जाता रहा. कारण भी कुछ ऐसा ही है कि हवाई अड्डे पर तीनो शिफ्ट में नौकरी चलती थी. दिन काफी तेजी से भागे जा रहा था, न जाने क्या-क्या सोचता पर कर कुछ नहीं पता.
हवाई अड्डे पर आने से पहले मुझे ट्रेनिंग के लिए विले परले में ही दूसरी जगह जाना पड़ता था. पर जब हवाई अड्डे पर तैनात हुआ तब परला स्टेशन से पैदल ही चलकर जाया करता था. मुझे ऐसा लगता था की मैं बहुत आलसी हूँ, इसलिए थोड़ी-बहोत चलने की कोशिश करता था.
इसी तरह चलकर आने-जाने में मेरी नज़र एक केलेवाली पर पड़ी जिसके बालों में सफेदी ७०% तक आ चुकी थी, शरीर एकदम दुबला सिर्फ हड्डियाँ ही बची थीं, शारीर का रंग खून की कमी को दर्शाता था, पैरों में चप्पल नहीं थी और कपडे तो काफी अजीब थे केशरी रंग की हाफ कमीज़ और उसी रंग की हाफ स्कर्ट. वह पूरी तरह से अजीब ही लग रही थी. उसकी दूकान एक बैंक के सामने फूटपाथ से सटकर थी. वह दूकान न तो ठेले पर थी और ना तो ज़मीन पर, लकड़े जैसी चीज़ मालूम पड़ती थी जो हमेशा प्लास्टिक से ढंकी रहती थी. उसे ऊपर से प्लास्टिक से ही तम्बू की तरह बनाया हुआ था जिसके अन्दर बैठकर वह केले बेचती थी. यही उसका घर भी था. अंदाज़ से उसकी दुकान ५ फिट ऊँची और ६ फिट चौड़ी होगी वही उसकी दुनिया लगाती थी.
एक दिन देखा कि अपनी दूकान से कुछ आगे आकर न जाने जोर-जोर से कुछ बडबडा रही थी- "यह तेरे बाप की जगह है, जा यहाँ से, इधर खड़ा नहीं होने का." मैं यह सब देखता हुआ ऑफिस चला गया. उसे देखकर ऐसा लगा जैसे वह कोई पागल है. हमेशा व्याकुल नज़र आती थी. उसके माथे पर हमेशा बल पड़ा नज़र आता था. चहरे पर उसके कभी हंसी या शांति का भाव नज़र नहीं आता था, हमेशा एक ही खिन्नता का भाव ही नज़र आता था. मैंने कभी उसके दूकान पर ग्राहक आते नहीं देखा था. न जाने उसका धंदा कैसे होता था.
मैंने हमेंशा उसे अकले ही देखा था, जैसे उसका कोई नहीं है. उसके दूकान के ही आगे ठेले पर एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति अपना फलों का धंदा लगाया करते थे. उन्हें देखकर कभी सोचता कि कहीं ये दोनों पति-पत्नी तो नहीं. शायद यह औरत किसी झगड़े के चलते अलग होकर वाही पास में ही अपना डेरा जमा लिया हो. पर यह सब तो सिर्फ एक तर्क ही था. क्योंकि जब तक किसी के बारे में सही बात नहीं मालूम हो जाती तो हम आप ही कुछ-न-कुछ कहानी बना लेते हैं.
आज सेकंड शीफ्ट से तीन बजे ही निकला, सोचा बस पकड़ लूं पर काफी देर तक नहीं आयी फिर सोचा की ऑटो से ही निकल चलूँ, पर आज ऑटो भी नदारद सो पैदल ही चल दिया. आज-कल पैदल चलना कम हो जाने की वजह से १५ से २० मिनट भी चलना भरी लगता था. ये आदत सभी कि बिगड़ गयी है जिसका कारण है वक़्त कि कमी और आमदनी में बढ़ोत्तरी. ऑफिस से स्टेशन केवल २० मिनट कि दूरी पर ही था सो मैं निकल गया. रस्ते में देखा कि
म्युनिसिपल कारपोरेशन कि धाड़ पड़ी है. इस धाड़ में धंदा करनेवालों का सामान सरकारी कर्मचारी उठा ले जाते हैं और जुर्माना भरने पर वापस दे देते हैं. कुछ लोग सामान के अनुसार जुर्माना भरते हैं. अगर जुर्माने कि रकम सामान से ज्यादा है तो जुर्माना देना बेकार ही होता, पर जिसका सामान किमती होता था वे जुर्माना भरकर अपना सामान छुड़ा लेते थे. जिसका सामान कोई छुड़ाने नहीं आता तो कर्मचारियों का फायदा हो जाता. एक दिन सड़क के सभी ठेले वालों को हटाने का कार्यक्रम चल रहा था. महानगर पालिका कि ट्रक में से कर्मचारी ऐसे ठेलेवालों का सामान उठाते जैसे उन्होंने कोई गुनाह या पाप कर दिया हो. वे ऐसे दौड़ लगते हैं जैसे उनको लूट-मार के लिए ही रक्खा गया है. महानगर पालिका कि गाड़ी देखते ही सभी रस्ते पर के धंदे वाले अपना सामान लेकर इधर-उधर गल्लियों में लेकर भागते. स्थिति ऐसी होती कि जैसे लूटेरों कि टोलियों के गाँव में आते ही सभी गाँव वाले अपनी जान हथेली पर लेकर भागने लग जाते हैं. सब कुछ ऐसे होता जैसे वे इन्सान नहीं, उनका जीवन नहीं, उनके परिवार नहीं, उनको पैसे कि ज़रुरत नहीं. सडकों पर से धंदेवालो को हटाने कि हर संभव कोशिश करते हैं, पर उंके लिए भी तो कोई इंतजाम सोचना चाहिए.
सारे मार्केट में सभी धंदे वाले इधर-उधर जहाँ कहीं भी गली-कूचे में जगह मिली छिप गए पर वह केलेवाली न ही वहां से हिली और ना ही कोई उसे हटाने आया. यह बात मुझे हजम नहीं हुई. मन में उधेड़बुन शुरू हो गया. आखिर इसका राज़ क्या है और कहा से पता चले? मैं अक्सर इस रास्ते से गुजरते वक़्त एक सेंडविच वाले के यहाँ जाया करता था. वह बहोत ही अच्छी सेंडविच बनाया करता था. कभी मैंने उसे कंजूसी करते नहीं देखा था. बातचीत के दौरान पता चला कि वह भी अपनी ही बिरादरी का है और उसकी बातें भी अपने अनुकूल होती थी इसलिए पहचान अच्छी हो गयी थी. पर उस दिन वह भी अपने ठेले के साथ वहां से नदारद था. चलो किसी और दिन पूछूंगा और मैं स्टेशन कि तरफ चल दिया.
एक बार अपनी दिन पाली करके दोपहर को छूटा और उस सेंडविच वाले के पास पंहुचा. दोपाहर को कम लोग होने कि वजह से मैंने बात शुरू कि, "उस दिन तुम कहाँ गायब हो गए थे? तुम नहीं दिखे तो मैं चला गया." उसने कहा, "साहब जी मुंसीपाल्टी कि धाड़ पड़ेगी तो भागना पड़ेगा ही ना?" मैंने आगे पूछा, "तुम लोग तो उनके आदमी से यहाँ खड़ा होने कि पावती लेते हो न?" वह बोला, "हाँ लेते तो हैं पर जो ज़मीन किसी नहीं कि वह सरकार कि हो जाती है, मतलब यह कि हमारा कुछ भी नहीं देश भी नहीं.." मैंने उसकी भावुकता को रोककर अपनी जिज्ञासा को आगे बढ़ाते हुए पूछा, "अरे उस दिन तो सभी भाग खड़े हुए थे पर वो केलेवालो को किसीने नहीं हटाने कि कोशिश कि, ऐसा क्यों? आखिर बात क्या है?" उसने जवाब दिया, "साहब बात तो मैं भी आज-तक कुछ नहीं समझ सका कि वो कौन है? कहाँ से आयी है? उसके कोई है या नहीं? जितना मैं जानता हूँ उस हिसाब से तो यह कुछ साल पहले कि बात है जब यह और इसकी बहन साथ में यहाँ आये थे. यहीं पर अपना केले का धंदा शुरू किया. दोनों का ही न किसीसे लगाव था और ना ही कोई बातचीत. एक तो काफी शांत-शांत रहा रहा करतीं थी. सभी से सुना था कि ये दोनों बहने किसी बड़े आदमी के पहचान से यहाँ आयी थीं. उन्होंने एक बैंक के सामने अपनी दुकान लगाई थी. कई बार बैंक वालों ने उन्हें वहां से अपनी ताम-झाम हटाने के लिए कह चुके थे. पर उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगी. एक जो काफी शांत थी शायद उसके पास सवाल के सही जवाब रहते थे पर दूसरी तो निहायत ही गुसैल स्वाभाव की थी. हर किसी से तू-तू मैं-मैं पर उतर आती थी. उसके झगड़े में गलियों का भी समावेश होता था, पर कई दिनों तक देखते-देखते समझ आया कि उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं. वह अक्सर राह चलते लोगो से भी उलझ जाती थी."
"काफी दिनों से कहने के बावजूद जब बैंकवालों ने म्युनिसिपल ऑफिस में उनकी कम्प्लेन कर दी तो वहां से कुछ कर्मचारी उन दोनों औरतों को वहां से हटाने के लिए पहुंचे तो उन दोनों ने अन्दर से फाइलों कि बण्डल में से एक फाइल निकली और उन लोगों के हाथ में थमा दी. उनका एक साहब था जो पूरी फाइल को उलटफेर कर देखने लगा फिर बैंक के अन्दर चला गया. कई बार अन्दर-बाहर होने के बाद वह फाइल उन औरतों को थमा कर वे सभी वहां से चले गए. किसी को पता नहीं कि उस फाइल में क्या था. उस दिन के बाद कभी किसीने उन दोनों को वहां से हटाने की कोशिश नहीं की. सारे ठेले वाले भाग खड़े होते हैं बस वही दोनों बेफिक्र वहां पड़े रहते हैं." यह सब सुनकर मैंने अपनी बढती परेशानी को दूर करने के लिए पूछा, "क्या अभी तक किसीको नहीं पता कि वे कौन हैं और कहाँ से आयें हैं?" उसने बताया कि कौन पता हरे उनका स्वाभाव ऐसा है कि कोई उनके पास ही नहीं जाना चाहता. पर तरस भी आता है कि जैसे-जैसे ज़िन्दगी बढ़ेगी वैसे-वैसे उनकी मुसीबत भी बढती जाएगी.
मैंने पूछा, " तुम्हे इतना सब कैसे पता?" उसने बताया, " मुझे इस जगह पर सत्रह साल गुजर चुके हैं और इतने सालों में इस आस-पास के जगह कि कई तस्वीरें और उनके कुछ चेहरे शायद मैं जानता हूँ पर पहचानता नहीं. सभी इस नज़र में कैद हैं. आपको तो उनमे से एक बहन के बारे में बताया ही नहीं और आपने भी पूछा नहीं कि अब वह कहाँ हैं? एक बार की बात है, इस औरत की एक बहन शाम को सोई और दूसरे दिन भी सोई रही. ये तो रोज़ की ही तरह अपना धंदा खोलकर बैठ गयी. कुछ आस-पास के ठेलेवालों ने भी आपस में बातें शुरू कर दी. शाम को लोगो की चिंता बढ़ने लगी. लोगो की शंका बढती गयी. पास के ही एक वृद्ध फलवाले ने दूसरे व्यक्ति को जाकर जांच-पड़ताल करने को कहा. वह व्यक्ति हिम्मत कर उस औरत के पास गया और पूछा कि क्या बात है तुम्हारी बहन कि तबियत ठीक नहीं है क्या? उसने अपनी चिर-परिचित अंदाज़ में आँखें तरेरकर और माथे को सिकोड़कर बोली, "वो सो रही है भागो यहाँ से." उस व्यक्ति ने वापस पूछा, "तबियत ना ठीक हो तो डॉक्टर के पास ले चलें?" पर वो फिर से गुस्साई और बोली, "तुम लोगों को क्या करना है, तुम सब उसे मार डालोगे. कुछ नहीं जाओ यहाँ से." फिर ढेर सारी गलियों कि बौछार कराती रही पर किसीको भी पास जाने नहीं दिया.
तीन दिनों तक जब वह नहीं उठी तो लोगो ने पुलिसवालों को उन औरतों के बारे में बता दिया. उन पुलिस वालों ने म्युनिसिपल हॉस्पिटल वालों को फोन कर अम्ब्युलेंस बुलवाया, जब वे उस महिला को ले जाने के लिए गए तो उस केलेवाली ने तो आतंक मचा दिया. "तुम सब कहा ले जा रहे हो, वो मर जाएगी तुम सब जान लेलोगे उसकी, उसको कुछ नहीं हुआ है." सभी आस-पास के फलवालों ने और भाजीवाले उसे कहने लगे कि उसे अस्पताल ले जा रहे हैं, जब ठीक हो जाएगी तो पहुंचा देंगे. "साहब बड़ी मुश्किल हुयी थी उसकी बहन को ले जाने में. वह तो समझाने बुझाने पर भी नहीं मान रही थी. काफी जोर-ज़बरदस्ती से उसे लेकर गए थे. हॉस्पिटल लेकर जाने के बाद पता चला कि वह दो दिन पहले ही मर चुकी थी."
वह केलेवाली रोज़ पूछने लगी कि उसे कब लेकर आओगे? सभी यही कहते कि उसकी तबियत जब ठीक हो जायेगी तब ले आयेंगे. उसकी तबियत भी काफी ख़राब है ना, ठीक होने में वक़्त लगेगा. वह इसी तरह रोज़ पूछती रहती और झूठे जवाब का सिलसिला आज तक चल रहा है. शुरू के कुछ दिन तो उसके चेहरे पर उदासी कि झलक भी दिखाई देने लगी थी. मैंने कहा, "अरे यार मैं कुछ दिनों से अक्सर देख रहा हूँ कि वह एक सा भाव चेहरे पर लेकर कभी चुप-चाप सड़कपर देखती रहती है, कभी अकेले ही बड-बडाती है, कभी रोड पर पहुचंकर ग्लास का पानी फेकने लगाती हैं. अब शयद उसके केले भी बिकने बंद हो गए हैं.....


