जीवन में हर कोई गलती करता है, बस फर्क कम और ज्यादा का ही होता है। गलतियां तो हम करते रहते हैं माफ़ कीजियेगा हम नहीं मै करता रहता हूँ, क्योंकि कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं की उन्होंने कभी गलती नहीं की बस इसलिए यहाँ पर सिर्फ अपनी ही गलती के बारे में कहूँगा।
मैंने कभी सोचा नहीं था की गलती किसे कहते है , क्योंकि जबसे याद आ रहा है मैं काफी छोटा था पर पता नहीं कैसे वह सारी बांते याद है जो शायद गलत थी ...... आज तो ऐसा लगता है की मैं अब जानबूझकर भी गलतियां कर रहा हूँ जो नहीं करनी चाहिए , पर शायद लगता है कि कभी-कभी तो मजबूर होना पड़ता है।
मैं बचपन में बहुत ही लालची था, किसी बेकार सी चीज़ के लिए भी ललच जाता था और ये लालच ही है जिसकी वजह से आदमी चोरी भी सीख लेता है, मैंने भी की थी ......मैं तब घाटीपाडा में एक मुनिसिपल स्कूल में पढ़ता था। स्कूल से घर जाते वक़्त रस्ते में एक मैदान में कुछ बच्चे पतंग उड़ा रहे थे मैं भी कुछ सहपाठियों के साथ वहा से गुज़रा उन बच्चोको पतंग उड़ाते देख मै रूक गया अचानक मेरी नज़र उनके धागों के ढेर पर गयी , मेरे मन में लालच आ गया मैंने ये भी सोचा की बाकी के सहपाठी क्या सोचेंगे फिर भी मैंने उस अनुपयोगी सी चीज़ को भी ले भगा। वह लड़का भी मेरे पीछे भगा कुछ दूर जाकर मुझे दीदी मिली और उसने मुझे रोक लिया । वह हमेशा मुझे लेने आती थी, बोली क्या हुआ क्यों भाग रहा है ? वह लड़का जो की मेरा पीछा कर रहा था बोला ये मेरा मांजा(धागा) चोरी करके भाग रहा था। दीदी बोली दे , " चल दे उसका धागा , नहीं तो घर पर बोल दूँगी तो मार खायेगा।" मैंने धागा दे दिया। दूसरे दिन स्कूल में सभी मेरा मजाक उड़ाने लगे - ये देख तिवारी कल चोरी करके भगा था, ये पंडित साला लालची है।
यह तो मेरी गलती थी जो मुझे याद है , हमेशा याद भी रहेगी। पता नहीं क्यों मुझे यह सब याद रह गयी हैं। पर एक गलती और भी थे जो आज तक नहीं समझ सका की क्यों मुझे दोषी ठहराया गया ।
बात है तब की जब मैं पहली कक्षा में जाया करता था। तब भैया ३री में और दीदी ६ ठी में पढ़ते थे। हम सभी साथ ही जाया करते थे। मुझे याद है मैं तब काफी चुप रहता था, बारिश तेज हो जाती तो बहार देखकर मुझे डर रगता था। मुझे वह दिन भी याद है जब हम स्कूल जा रहे थे और बारिश तेज हो रही थी, मैं भैया और दीदी के साथ बिल्डिंग से नीचे उतरा तो तेज बारिश को देख कर बोला मैं नहीं जाऊंगा । दीदी बोली अरे चल कुछ नहीं होगा और मेरा हाथ पकड़ कर खीचने लगी । मैं रोने लगा और हाथ छुड़ा कर भाग आया था। शायद मैं अब भी डरपोक ही हूँ। एक दिन दोपहर की आधी छुट्टी हुयी थी मैं क्लास के दरवाजे के पास ही बैठता था वह सभी ज़मीन पर ही बैठते थे। उस दिन पता नहीं क्या सुझा मस्ती में एक लड़का जो भागकर दरवाज़े से बहार जा रहा था मैंने पैर फंसाकर गिरा दिया जब वह रोने लगा तो मैं भाग गया और दीदी की क्लास में बैठ गया । जब आधी छुट्टी खत्म होने की घंटी लगी तो मैं डरते हुए अपनी क्लास में आया और अपनी जगह पर आ कर बैठ गया। यहाँ पर किसी बच्चे का कुछ चोरी हो गया था और आपस में बाते कर रहे थे की किसने चुराया है। एक ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा की , " यही चोर है , मैंने इसको भागकर जाते हुए देखा था।" तभी हमारी टीचर भारती कोठारी आयीं और उन्हें भी बताया गया की मैंने चोरी की है। टीचर जी ने आकर पूछा की किसका चोरी हुआ है और किसने चोरी किया है? सबने कहा की बहनजी इसने ही किया है और चोरी करके भाग गया था। हम सभी बच्चे अपने अध्यापिका को बहनजी ही कहा करते थे। बहनजी ने मुझा आकर कहा की दे उसका वापस मैंने कहा की मैंने नहीं चुराया, मैं तो अपनी बहन के पास गया था। एक ने कहा हां ये अपनी बहन को दिया रहेगा। बहनजी ने कहा जा अपनी बहन को बुलाकर ला। मैं अपने बहन को बुला कर लाया तो। बच्चे कहने लगे की इसने चोरी किया है और दे नहीं रहा है। दीदी ने मुझसे पूछा, " क्या चुराया है?" मैंने जवाब दिया , " नहीं।" बहनजी ने कहा, "इसका बैग देखो उसमे रहेगा।" दीदी बस्ता देखने लगी सबके सामने चेक हुआ पर कुछ नहीं मिला। दीदी गुस्से में बोली, "किधर है उसके बस्ते में किसी और ने चुराया होगा।" दीदी यह बोलकर चली गयी। जाते ही टीचर ने कहा ये दोनों भाई-बहन पक्के चोर हैं।
भारती कोठारी टीचर का वह नफ़रत से मुझे देखते हुए जाना अच्छी तरह से याद है पर ये याद नहीं की उस चोरी का क्या हुआ, मैं उस वक़्त समझ ही नहीं सका की ये सब क्यों इलज़ाम लगा रहे हैं? मैंने तो चोरी की ही नहीं थी फिर किसी ने चोरी करते देखा तो देखा कैसे ?
समझदार बने। किसी के कहने से ही दूसरों को दोषी न मान लें। सवाल-जवाब का दबाव सिर्फ दोषी माने गए व्यक्ति पर ही नहीं दोष लगाने वाले पर भी हो, क्योंकि वह खुद भी झूठा हो सकता है।
मैंने कभी सोचा नहीं था की गलती किसे कहते है , क्योंकि जबसे याद आ रहा है मैं काफी छोटा था पर पता नहीं कैसे वह सारी बांते याद है जो शायद गलत थी ...... आज तो ऐसा लगता है की मैं अब जानबूझकर भी गलतियां कर रहा हूँ जो नहीं करनी चाहिए , पर शायद लगता है कि कभी-कभी तो मजबूर होना पड़ता है।
मैं बचपन में बहुत ही लालची था, किसी बेकार सी चीज़ के लिए भी ललच जाता था और ये लालच ही है जिसकी वजह से आदमी चोरी भी सीख लेता है, मैंने भी की थी ......मैं तब घाटीपाडा में एक मुनिसिपल स्कूल में पढ़ता था। स्कूल से घर जाते वक़्त रस्ते में एक मैदान में कुछ बच्चे पतंग उड़ा रहे थे मैं भी कुछ सहपाठियों के साथ वहा से गुज़रा उन बच्चोको पतंग उड़ाते देख मै रूक गया अचानक मेरी नज़र उनके धागों के ढेर पर गयी , मेरे मन में लालच आ गया मैंने ये भी सोचा की बाकी के सहपाठी क्या सोचेंगे फिर भी मैंने उस अनुपयोगी सी चीज़ को भी ले भगा। वह लड़का भी मेरे पीछे भगा कुछ दूर जाकर मुझे दीदी मिली और उसने मुझे रोक लिया । वह हमेशा मुझे लेने आती थी, बोली क्या हुआ क्यों भाग रहा है ? वह लड़का जो की मेरा पीछा कर रहा था बोला ये मेरा मांजा(धागा) चोरी करके भाग रहा था। दीदी बोली दे , " चल दे उसका धागा , नहीं तो घर पर बोल दूँगी तो मार खायेगा।" मैंने धागा दे दिया। दूसरे दिन स्कूल में सभी मेरा मजाक उड़ाने लगे - ये देख तिवारी कल चोरी करके भगा था, ये पंडित साला लालची है।
यह तो मेरी गलती थी जो मुझे याद है , हमेशा याद भी रहेगी। पता नहीं क्यों मुझे यह सब याद रह गयी हैं। पर एक गलती और भी थे जो आज तक नहीं समझ सका की क्यों मुझे दोषी ठहराया गया ।
बात है तब की जब मैं पहली कक्षा में जाया करता था। तब भैया ३री में और दीदी ६ ठी में पढ़ते थे। हम सभी साथ ही जाया करते थे। मुझे याद है मैं तब काफी चुप रहता था, बारिश तेज हो जाती तो बहार देखकर मुझे डर रगता था। मुझे वह दिन भी याद है जब हम स्कूल जा रहे थे और बारिश तेज हो रही थी, मैं भैया और दीदी के साथ बिल्डिंग से नीचे उतरा तो तेज बारिश को देख कर बोला मैं नहीं जाऊंगा । दीदी बोली अरे चल कुछ नहीं होगा और मेरा हाथ पकड़ कर खीचने लगी । मैं रोने लगा और हाथ छुड़ा कर भाग आया था। शायद मैं अब भी डरपोक ही हूँ। एक दिन दोपहर की आधी छुट्टी हुयी थी मैं क्लास के दरवाजे के पास ही बैठता था वह सभी ज़मीन पर ही बैठते थे। उस दिन पता नहीं क्या सुझा मस्ती में एक लड़का जो भागकर दरवाज़े से बहार जा रहा था मैंने पैर फंसाकर गिरा दिया जब वह रोने लगा तो मैं भाग गया और दीदी की क्लास में बैठ गया । जब आधी छुट्टी खत्म होने की घंटी लगी तो मैं डरते हुए अपनी क्लास में आया और अपनी जगह पर आ कर बैठ गया। यहाँ पर किसी बच्चे का कुछ चोरी हो गया था और आपस में बाते कर रहे थे की किसने चुराया है। एक ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा की , " यही चोर है , मैंने इसको भागकर जाते हुए देखा था।" तभी हमारी टीचर भारती कोठारी आयीं और उन्हें भी बताया गया की मैंने चोरी की है। टीचर जी ने आकर पूछा की किसका चोरी हुआ है और किसने चोरी किया है? सबने कहा की बहनजी इसने ही किया है और चोरी करके भाग गया था। हम सभी बच्चे अपने अध्यापिका को बहनजी ही कहा करते थे। बहनजी ने मुझा आकर कहा की दे उसका वापस मैंने कहा की मैंने नहीं चुराया, मैं तो अपनी बहन के पास गया था। एक ने कहा हां ये अपनी बहन को दिया रहेगा। बहनजी ने कहा जा अपनी बहन को बुलाकर ला। मैं अपने बहन को बुला कर लाया तो। बच्चे कहने लगे की इसने चोरी किया है और दे नहीं रहा है। दीदी ने मुझसे पूछा, " क्या चुराया है?" मैंने जवाब दिया , " नहीं।" बहनजी ने कहा, "इसका बैग देखो उसमे रहेगा।" दीदी बस्ता देखने लगी सबके सामने चेक हुआ पर कुछ नहीं मिला। दीदी गुस्से में बोली, "किधर है उसके बस्ते में किसी और ने चुराया होगा।" दीदी यह बोलकर चली गयी। जाते ही टीचर ने कहा ये दोनों भाई-बहन पक्के चोर हैं।
भारती कोठारी टीचर का वह नफ़रत से मुझे देखते हुए जाना अच्छी तरह से याद है पर ये याद नहीं की उस चोरी का क्या हुआ, मैं उस वक़्त समझ ही नहीं सका की ये सब क्यों इलज़ाम लगा रहे हैं? मैंने तो चोरी की ही नहीं थी फिर किसी ने चोरी करते देखा तो देखा कैसे ?
समझदार बने। किसी के कहने से ही दूसरों को दोषी न मान लें। सवाल-जवाब का दबाव सिर्फ दोषी माने गए व्यक्ति पर ही नहीं दोष लगाने वाले पर भी हो, क्योंकि वह खुद भी झूठा हो सकता है।
